एक पत्र बेटी के नाम – प्रतिभा श्रीवास्तव अंश

आज का दिन बहुत महत्वपूर्ण हैं मेरे लिए।आज के दिन ही  तुमने  ने मुझे मातृत्व के सुख से आनंदित किया था ।और आज इतने वर्षों बाद तुम्हारे जन्मदिन पर कुछ कहना चाहती हूं बेटा –

 

दिन,महिनें साल कब कैसे बीत गये, पता भी न चला।ऐसा लगता है जैसे कल की ही बात हो,जब तुम ईश्वर का आशीर्वाद बनकर मेरे आँचल में आई थी।तुम्हारे आने से मेरे जीवन में संपूर्णता का समावेश हुआ।एक उद्देश्य मिला तम्हे सम्भालने का तुम्हारा पग पग पर ध्यान रखने का।कभी कभी लगता जब तुम बड़ी हो जाओगी तो मेरी जिम्मेवारी थोड़ी कम हो जाएगी पर बेटा यह मेरा भ्रम था।अब जब तुम बड़ी हो रही हो ,तो पहले की अपेक्षा मेरी जिम्मेवारी और बढ़ रही है।जमाना काफी बदल गया है बेटा, आज हर चौराहे पर भेड़िया तुम्हारा रास्ता रोके खड़ा रहेगा।बच्चे माँ-बाप हर जगह साथ नही होते इसलिए तुम्हे अब अपना ख्याल खुद रखना होगा।जानती हो बेटा, बेशक हमारे अपने हमारे साथ होते है पर हमें अपनी लड़ाई खुद लड़नी पड़ती।मैं भी चाहती हूं कि तुम-

 

धीर बनो,गम्भीर बनो,

 

बनों बिटिया तुम सीता सी,

 

जो रावण के लंका में रहकर भी,

 

फटकार लगाती रावण को।।

 

यशस्विनी बनो,तेजस्विनी बनो,

 

बनों वीर लक्ष्मी बाई सी,

 

जो दुश्मन के छक्के छुड़ाती थी,

 

ना खुद को कम समझती थी।

 

शील बनो,संस्कारी बनो,

 

बनो बिटिया तुम ऐसा कुछ,

 

घर परिवार समाज देश को,

 

हो,अभिमान हम सब को तुझ पर।

 

तुम्हारी माँ।

एक पत्र बेटी के नाम

 

आज का दिन बहुत महत्वपूर्ण हैं मेरे लिए।आज के दिन ही  तुमने  ने मुझे मातृत्व के सुख से आनंदित किया था ।और आज इतने वर्षों बाद तुम्हारे जन्मदिन पर कुछ कहना चाहती हूं बेटा –

 

दिन,महिनें साल कब कैसे बीत गये, पता भी न चला।ऐसा लगता है जैसे कल की ही बात हो,जब तुम ईश्वर का आशीर्वाद बनकर मेरे आँचल में आई थी।तुम्हारे आने से मेरे जीवन में संपूर्णता का समावेश हुआ।एक उद्देश्य मिला तम्हे सम्भालने का तुम्हारा पग पग पर ध्यान रखने का।कभी कभी लगता जब तुम बड़ी हो जाओगी तो मेरी जिम्मेवारी थोड़ी कम हो जाएगी पर बेटा यह मेरा भ्रम था।अब जब तुम बड़ी हो रही हो ,तो पहले की अपेक्षा मेरी जिम्मेवारी और बढ़ रही है।जमाना काफी बदल गया है बेटा, आज हर चौराहे पर भेड़िया तुम्हारा रास्ता रोके खड़ा रहेगा।बच्चे माँ-बाप हर जगह साथ नही होते इसलिए तुम्हे अब अपना ख्याल खुद रखना होगा।जानती हो बेटा, बेशक हमारे अपने हमारे साथ होते है पर हमें अपनी लड़ाई खुद लड़नी पड़ती।मैं भी चाहती हूं कि तुम-

 

धीर बनो,गम्भीर बनो,

 

बनों बिटिया तुम सीता सी,

 

जो रावण के लंका में रहकर भी,

 

फटकार लगाती रावण को।।

 

यशस्विनी बनो,तेजस्विनी बनो,

 

बनों वीर लक्ष्मी बाई सी,

 

जो दुश्मन के छक्के छुड़ाती थी,

 

ना खुद को कम समझती थी।

 

शील बनो,संस्कारी बनो,

 

बनो बिटिया तुम ऐसा कुछ,

 

घर परिवार समाज देश को,

 

हो,अभिमान हम सब को तुझ पर।

 

तुम्हारी माँ।

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