सरोज भाटी की रचना

* प्रदूषण *

 

 

 

 

धूंआ धूंआ धरा हुई है
असमंजस में है अंबर
मानव आज कर रहा है
प्रदूषण संग स्वयंवर

रवि रंज में डूब गया
रश्मियां हुई है उदास
नादान परींदे भटक रहे
मायूस और निराश

वृक्ष लताऐं विकल है
खो रही है धीर
इन्सानी करतुतों से
प्रदूषित हुई समीर

ताल तलैया कूप का
रीत रहा है अंतर
प्रदूषण की मार से
घट रहा जल स्तर

सागर सरिता मिलन को
हो गया है अधीर
सूखी सरिता दूषित जल
मन में बहुत है पीर

देख जटिलता जीवन की
समझा जीवन सार
प्रकृति की सम्पदा ही
है जीवन आधार
प्रकृति संरक्षण प्रथम कर्म है
यही हमारा प्रथम धर्म है

सरोज भाटी

 

सरोज भाटी-संयोजिका-मगसम

आपको “रचना स्वर्ण प्रतिभा सम्मान”देहरादून में दिनांक 2 अप्रैल 2018 को मगसम की तरफ से प्रदान किया जाएगा।

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