ग़ज़ल – प्रखर दीक्षित

ग़ज़ल
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खूँ रेजी आतंक के ये मंजर क्यों हैं।
मुलम्मों को हाथों में खंजर क्यों हैं।।

बात हर मसले का हल होता जनाब
फिर क्रूर हाथों में ये पत्थर क्यों है।।

वादों का मरहम और सियासी टानिक
ये सिसकते अश्क ए समन्दर क्यों है।।

जब भरोसा इमदाद की पैरोकारी भी
मीत वादी में ग़म का बवंडर क्यों है।।

जाना जहाँ से तुम्हें खाली ही फिर
हर शख्स ऐंठा… सिकंदर क्यों है।।

हंसकर मिले पर प्रखर दूरी बनाए
टूटा है सिसकता वो अंदर क्यों है।।

प्रखर दीक्षित
फर्रुखाबाद

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